70वें स्थापना दिवस पर संस्कृति और गौरव का उत्सव

मध्यप्रदेश के 70वें स्थापना दिवस समारोह “अभ्युदय मध्यप्रदेश” के तीसरे और अंतिम दिन भोपाल के लाल परेड मैदान में कला, संस्कृति, आस्था और गौरव का भव्य संगम देखने को मिला। तीन दिन तक चला यह आयोजन एक शानदार दृश्य के साथ संपन्न हुआ, जब मंच पर “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य का अद्भुत मंचन किया गया।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की मौजूदगी ने इस आयोजन को और भी विशेष बना दिया। इस समारोह ने न केवल प्रदेश की 70 वर्षों की यात्रा को उजागर किया, बल्कि लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अवसर भी प्रदान किया।
सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य ने जीता दिल
समारोह की सबसे बड़ी आकर्षण रहा — “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य।
विशाल मंच, पारंपरिक संगीत, सुंदर नृत्य और भावनात्मक अभिनय ने दर्शकों को मानो उज्जैन के महान युग में पहुँचा दिया।
यह प्रस्तुति सिर्फ मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह याद दिलाने वाली थी कि भारतीय संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी और प्रेरणादायी हैं।
विक्रमादित्य की गाथा यह संदेश देती है कि न्याय और लोककल्याण पर आधारित नेतृत्व समाज को हमेशा प्रगति की ओर ले जाता है।
मुख्यमंत्री ने कलाकारों और संस्कृति का किया सम्मान
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कलाकारों के समर्पण की सराहना करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य केवल एक ऐतिहासिक चरित्र नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा के प्रतीक हैं।
उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश आज भी विक्रमादित्य के आदर्शों को अपनाकर आगे बढ़ रहा है और “अभ्युदय मध्यप्रदेश” इन्हीं मूल्यों का प्रतीक है।
डॉ. यादव ने यह भी बताया कि राज्य सरकार आने वाले समय में कला, संस्कृति और पर्यटन के क्षेत्र में और भी पहलें जारी रखेगी।
तीन दिनों तक भोपाल में छाया ‘अभ्युदय’ का रंग
तीनों दिन राजधानी भोपाल सांस्कृतिक रंगों में रंगा रहा:
- पहला दिन: लोककला, जनजातीय संस्कृति और हस्तशिल्प की झांकी
- दूसरा दिन: “सम्राट विक्रमादित्य” महानाट्य का भव्य मंचन
- तीसरा दिन: लोकगीत, नृत्य और सांस्कृतिक प्रदर्शनी के साथ भव्य समापन
हजारों नागरिक, छात्र और पर्यटक इस उत्सव का हिस्सा बने, जिससे पूरा शहर एक सांस्कृतिक मेले जैसा नजर आया।
प्रदेश की लोकसंस्कृति की शानदार प्रस्तुतियाँ
मंच पर प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए कलाकारों ने अपनी-अपनी लोकसंस्कृति की अद्भुत झलक पेश की।
बघेली, निमाड़ी, मालवी और गोंडी लोकनृत्यों ने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया।
विशेष प्रस्तुतियाँ:
- नर्मदा स्तुति
- मां ताप्ती आरती
- महाकाल स्तवन
इन प्रस्तुतियों ने लोगों को आस्था और गर्व से भर दिया।
यह स्पष्ट हुआ कि मध्यप्रदेश केवल भौगोलिक रूप से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी भारत का हृदय प्रदेश है।
मुख्यमंत्री का संदेश: “संस्कृति से ही विकास की राह”
मुख्यमंत्री ने कहा कि संस्कृति और विकास एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
जब कोई राज्य अपनी परंपराओं को सम्मान देता है, तो उसकी प्रगति अधिक स्थायी और मजबूत होती है।
उन्होंने कहा कि “अभ्युदय मध्यप्रदेश” नई पीढ़ी को अपने इतिहास, पहचान और गौरव से जोड़ने की एक महत्वपूर्ण पहल है।
समापन पर गूंजे जयकारे, उमड़ा जनसैलाब
समापन के दौरान जब मैदान में “जय विक्रमादित्य” के नारे गूंजे, तो पूरा लाल परेड मैदान उत्साह से भर उठा।
लोगों में इतिहास का गर्व और भविष्य के प्रति विश्वास दोनों साफ दिखाई दिए।
मुख्यमंत्री ने आश्वस्त किया कि आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश संस्कृति, शिक्षा और नवाचार के संगम से नई ऊंचाइयां हासिल करेगा।
निष्कर्ष: राज्य की आत्मा का उत्सव
“अभ्युदय मध्यप्रदेश” केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था—यह एक ऐसा उत्सव था जहां इतिहास ने वर्तमान से हाथ मिलाया और भविष्य की दिशा तय की।
सम्राट विक्रमादित्य की प्रेरणादायी गाथा के साथ यह आयोजन मध्यप्रदेश की समृद्ध संस्कृति और विकासशील सोच का प्रतीक बनकर हमेशा याद किया जाएगा।

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