हिमाचल प्रदेश विधानसभा का बड़ा फैसला

शिमला: हिमाचल प्रदेश विधानसभा में शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया। नगर निगम और नगरपालिका संशोधन विधेयक 2025 को विपक्ष के विरोध के बावजूद ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

अब, नवगठित नगर निगमों और स्थानीय निकायों में चुनाव दो साल तक टाले जा सकेंगे।

सरकार का तर्क: संसाधनों की कमी

ग्रामीण विकास मंत्री अनिरुद्ध सिंह ने कहा कि:

  • नवगठित निकायों में कर्मचारी, कार्यालय स्थान और वित्तीय संसाधनों की कमी है।
  • चुनाव तुरंत कराना व्यावहारिक नहीं है।
  • इस संशोधन से सरकार प्रशासनिक सुधार करने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने बताया कि शहरी जनसंख्या में 60% वृद्धि हो चुकी है। साथ ही, ओबीसी जनसंख्या के सही आंकड़े हासिल करने के लिए शहरी सर्वेक्षण किया जाएगा।

विपक्ष का विरोध: जनभावना के खिलाफ कदम

विपक्षी दल भा.ज.पा. ने इस फैसले पर तीव्र विरोध जताया।

  • नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा: “सरकार जनता की राय से डरकर चुनाव से भाग रही है।”
  • उनका कहना था, “यह कदम लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।”

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने पहले ही नगर निगमों और पंचायतों का गठन किया था, अब वह चुनाव टालने के लिए नए बहाने बना रही है।

विधायकों का विरोध

कई विपक्षी विधायकों ने इस संशोधन को जनविरोधी बताया।

  • रणधीर शर्मा (नैना देवी): “अगर सरकार आत्मविश्वासी है, तो चुनाव से क्यों डर रही है?”
  • सतपाल सिंह सत्ती (ऊना): “यह ओबीसी आरक्षण के नाम पर सभी चुनावों को टालने की चाल है।”

इसके अलावा, आशीष शर्मा (हमीरपुर) और अन्य विधायकों ने भी इस कदम का विरोध किया।

मंत्री का जवाब: विपक्ष के आरोप खारिज

अनिरुद्ध सिंह ने विपक्ष के आरोपों को नकारते हुए कहा:

  • “इस संशोधन से संविधान का उल्लंघन नहीं हो रहा है।”
  • “दूसरे राज्यों में भी ऐसे चुनाव स्थगित किए गए हैं।”
  • “सरकार किसी भी वर्ग, खासकर ओबीसी, के साथ अन्याय नहीं करना चाहती।”

सदन में गर्म बहस

सदन में इस मुद्दे पर बहस तेज थी। विपक्ष लगातार नारेबाजी करता रहा।
लेकिन अंत में, विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया ने विधेयक को ध्वनिमत से पारित करवा दिया।

अब सरकार को दो साल का समय मिला है, ताकि नवगठित निकायों के लिए जरूरी संसाधन और व्यवस्थाएं तैयार की जा सकें।

एक नया विवाद

हिमाचल प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों को दो साल तक टालने का फैसला राज्य की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर रहा है।

  • सरकार इसे संसाधनों की कमी और प्रशासनिक सुधार बता रही है,
  • जबकि विपक्ष इसे जनता की राय से बचने की रणनीति मान रहा है।

यह मामला अदालतों तक जा सकता है और राज्य की राजनीति में एक बड़ा सवाल बन सकता है।

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